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संत पापा फ्रांसिस आमदर्शन समारोह में संत पापा फ्रांसिस आमदर्शन समारोह में 

संत पापाः सद्गुणों का विकास पवित्र-आत्मा की सहायता में

संत पापा फ्रांसिस ने संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रागँण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों के संग अपने आमदर्शन समारोह के कार्यक्रम में भाग लिया। उन्होंने सद्गुणों पर अपनी धर्मशिक्षा की शुरूआत की।

वाटिकन सिटी

संत पापा फ्रांसिस ने सभों का अभिवादन करते हुए कहा कि मैं आप सभों का स्वागत करता हूँ। अब तक ठंढ़ से थोड़ा ठीक नहीं होने के कारण मैंने अपनी धर्मशिक्षा माला को मान्यवर पियेरलुजी जेरोली को पढ़ने का आग्रह किया है। हम सभी ध्यान दें यह हमारे लिए बहुत अच्छा है।  

अवगुणों पर अपनी चर्चा खत्म करने के बाद अब हम सद्गुणों की चर्चा करते हैं जो अवगुणओं के विपरीत समान्तर रुप में अपने को दर्पण देखते की भांति है। मानव का हृदय सभी बुराइयों में घिरा रह सकता है, यह अपने में उन हानिकार प्रलोभनों की ओर ध्यान दे सकता है जो विभिन्न रुपों में उसे घेरे रहते हैं लेकिन यह उन सभों का प्रतिकार भी कर सकता है। चाहे वे कितने भी कठोर क्यों न हों मानव अपने में अच्छाई हेतु बनाया गया है जो उसे सही अर्थ में परिपूर्ण प्रदान करती है, और वह उस कला को अपने में अभ्यास कर सकता है जो उसमें एक निरंतरता बन जाती है। इस आश्चर्यजनक संभावना पर चिंतन हमारे लिए   नौतिकता के दर्शनशास्त्र-गुणों के अध्याय की शुरुआत करता है।

सद्गुणी का व्यक्तित्व

रोम के दर्शनशास्त्रियों ने इसे सदगुणों की संज्ञा दी है तो वहीं यूनानी इसे अरेते कहते हैं। जबकि लातीनी शब्दावली इसे शक्तिशाली गुणवान व्यक्ति, साहसी, अनुशासन और तपस्या के योग्य घोषित करता है, अतः सद्गुणों का विकास एक लम्बे अभ्यास के माध्यम होता है जहाँ हम प्रयास और यहाँ तक की साधना को पाते हैं। यूनानी शब्द वहीं हमें श्रेष्ठता के भाव को प्रकट करता है, जो प्रशंसा के काबिल है। सद्गुणी इस भांति अपने में पद भ्रष्ट नहीं होता, बल्कि वह अपने जीवन में अपने कार्यो को निष्ठा से करते जाता है, वह अपने जीवन के मर्म को समझता है।

गुणों के अध्याय की खोज करें

हम अपने में यह विचार करते हुए गलत होंगे कि संतगण अपने में मानवता के अपवाद हैं, यह हमारे लिए एक गलत धारण होगी कि वे अपने में एक विजेता हैं जिन्होंने हमसे परे जीवनयापन किया। संतगण अपने में वे लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन में सिद्धि प्राप्त कर ली जिन्होंने अपने जीवन की बुलाहट को पूर्णरूपेण जीया। यह दुनिया अपने में कितनी खुशहाल हो सकती है यदि हम न्याय, सम्मान, एक दूसरे के लिए भलाई का जीवन, विस्तृत मानसिकता और आशा को अपने में एक दूसरे के साथ साझा करते जो हमारे लिए दुर्लभ विसंगति बनकर न रह जाती हो। यही कारण है वर्तमान समय के विकट परिस्थिति में हमारे लिए यह जरुरी हो जाता है कि हम सभी गुणों के अध्याय की पुनः खोजने करें और उसे अपने जीवन में जीने का अभ्यास करें। इस विकृत होती दुनिया में हम इस बात को याद करें कि हम किस रुप में बनाये गये हैं, हम सदैव ईश्वर के प्रतिरूप में बनाये गये हैं।

सद्गुण एक आदत

लेकिन हम सद्गुण को किस रुप में परिभाषित कर सकते हैंॽ काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा इसे एक ठोस और पुख्ता रुप में परिभाषित करते हुए कहती है, “सद्गुण आदतन और दृढ़ रुप में एक अच्छा कार्य करना है।” अतः यह यदाकदा या कामचलाऊ कोई कार्य नहीं है जो आसमान से टपकती हो। इतिहास हमें बतलाता है कि यहाँ तक अपराधियों ने भी अपने जीवन के शांतिमय क्षणों में अच्छे कार्य को किया, वे  कार्य ईश्वर की “पुस्तिका में दर्ज” किये गये हैं लेकिन गुण की बात कुछ और है। यह एक अच्छाई है जो एक व्यक्ति में धीरे-धीरे उसकी पौढ़ता से पनपती है और उसके व्यक्तित्व का अंग बनती जाती है। सद्गुण स्वतंत्रता में हमारी एक आदत है। यदि हम अपने सभी कार्यों में स्वतंत्र हैं, और यदि हमें हर समय अच्छाई और बुराई में चुनाव करना पड़ता है, तो सदगुण हमें सदैव अच्छी और सही चीजों के चुनाव की ओर अग्रसर करती है।

यदि सद्गुण हमारे लिए एक अति सुन्दर उपहार है तो हमारे लिए तुरंत एक सवाल उभर कर आता है, इसके हासिल करना कैसे संभव हैॽ इस सवाल का जवाब अपने में सहज नहीं है यह अपने में जटिल है।

संत पापाः सद्गुणों का विकास पवित्र आत्मा में

गुणों में विकास, आत्मा के कार्य

ख्रीस्तीय के लिए यहाँ हम पहली सहायता को ईश्वर की ओर से आता पाते हैं। वास्तव में, पवित्र आत्मा हम बपतिस्मा प्राप्त लोगों में कार्यशील रहते हैं, वे हमारे हृदय में कार्य करते और हमें सद्गुण जीवन की ओंर अग्रसर करते हैं। कितने ही ख्रीस्तीय हैं जिन्होंने आंसू बहते हुए पवित्रता को हासिल किया है उन्होंने अपने में इस बात का अनुभव किया कि कितनी ही कमजोरिया हैं जिन पर वे अपने में विजय प्राप्त नहीं कर सकते हैं। उन्होंने इस बात का अनुभव किया कि ईश्वर ने उनमें अपने नेक कार्य को पूरा किया है। कृपा हमारे लिए सदैव हमारी नौतिक प्रतिबद्धता से पहले आती है।

खुलापन हमारी निधि 

इससे भी बढ़कर हमें यह नहीं भूलना चाहिए जैसे कि हमें प्राचीन समृद्ध अपनी प्रज्ञा में कहती है, सद्गुण का विकास होता है और उसे हासिल किया जा सकता है। और ऐसा होने के लिए हम सर्वप्रथम पवित्र आत्मा से विशेष रूप में विवेक की याचना करने की आवश्यकता है। मनुष्य सुखों, भावनाओं, प्रवृत्तियों, जुनूनों पर विजय पाने के लिए अपने में स्वतंत्र नहीं है जब तक कि वह इनमें रहने वाली ताकतों, कभी-कभी तानाशाह, के खिलाफ कुछ करने में सक्षम न हो। हमारे पास एक अतिमूल्यवान निधि है जिसे हमें खुले दिल-दिमाग के रुप में धारण करते हैं, यहां हम अपने लिए विवेक को पाते हैं जिसके फलस्वरुप हम अपनी गलतियों से सीखते और अपने जीवन को एक सही दिशा देते हैं। और इसके बाद हमारी रुचि आती है जहाँ हम अपने लिए अच्छा करने का चुनाव करते हैं जिसके तहत हम कठोरता का अभ्यास करते और अति का परित्याग करते हैं।

प्रिय भाइयो एवं बहनो, इस भांति हम शांतिमय दुनिया में जो हमें चुनौती प्रदान करती सद्गुणों की यात्रा शुरू करते हैं, जो निश्चित रुप में हमारे लिए खुशी का कारण बनती है।  

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13 मार्च 2024, 12:05
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